অচ্ছা বদ তরসং গীর্ভিরাভিঃ স্তুহি পর্জন্যং নমসা বিবাস
Achchha bada tabasang
Aanushthanik Sangeet
अच्छा वद तरसं गीर्भिराभिः स्तुहि पर्जन्यं नमसा विवास । कनिक्रदद् वृषभो जीरदानु रेतो दधात्योषधीषु गर्भम् ॥ १ रि वृक्षान् हन्त्यत हस्ति रक्षसो विश्वं विभाय भुरनं महारधाৎ । उतानागा ईषते वृष्यारतो यৎ पर्जन्यः स्तनयन् हस्ति दुष्कृतः ॥ २ रथीर कशायाश्वाँ अभिक्षिपन्नरिदूतान् कृणुते वर्ष्यँ अह । दूराৎ सिंहस्य स्तनथा उदीरते यৎ पर्जन्यः कृणुते वर्ष्यं नभः ॥ ३ प्र राता रान्ति पतयन्ति रिद्यत उदोषधिर्जिहते पिषते स्वः । इरा विश्वस्मै भुरनाय जायते यৎ पर्जन्यः पृथिवीं रेतसारति ॥ ४ यस्य व्रते पृथिवी नंनमीति यस्य व्रते शफरज्जर्भुरीति । यस्य व्रत ओषधिरविश्वरूपाः स नः पर्जन्य महि शर्म यच्छ ॥ ५
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