अमल धवल पाले लेगेछे मन्द मधुर हाओय़ा–
देखि नाइ कभु देखि नाइ एमन
तरणी-वाओय़ा॥
कोन् सागरेर पार हते
आने कोन् सुदूरेर धन–
भेसे येते चाय़ मन,
फेले येते चाय़ एइ
किनाराय़ सव चाओय़ा सव पाओय़ा॥
पिछने झरिछे झरो झरो जल, गुरु गुरु देय़ा डाके,
मुखे एसे पड़े अरुणकिरण छिन्न मेघेर फाँके।
ओगो काण्डारी, के गो
तुमि, कार हासिकान्नार धन
भेवे मरे मोर मन–
कोन् सुरे आज
वाँधिवे यन्त्र, की मन्त्र हवे गाओय़ा॥
यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
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