য আত্মদা বলদা যস্য বিশ্ব উপাসতে প্রশিষং যস্য দেৱাঃ
Ja atmada balada
Aanushthanik Sangeet
य आत्मदा वलदा यस्य विश्व उपासते प्रशिषं यस्य देৱाः । यस्य छायाहमृतं यस्य मृत्युः कस्मै देৱाय हरिषा रिधेम ॥ यः प्राणतो निमिषतो महिषैक इद् राजा जगतो वभूৰ । य ईशै अस्य द्विपदशचतुष्पदः, कस्मै देৱाय हरिषा रिधेम ॥ यस्येमे हिमৱन्तो महिषा यस्य समुद्रं रसया सहान्नः । यस्येमाः प्रदिशो यस्य वाहु कस्मै देৱाय हरिषा रिधेम ॥ येन द्यौरुग्रा पृथिৱी च दृढा येन स्वः स्तम्भितं येन नाकः । यो अन्तरिक्षे रजसो रिमानः कस्मै देৱाय हरिषा रिधेम ॥ यं क्रन्दसी अरसा तस्तभाने, अभ्येक्षेतां मनसा रेजमाने, यत्राधि सूर उदितो रिभाति कस्मै देৱाय हरिषा रिधेम ॥ मा नो हिंसीज्जनिता यः पृथिৱ्या यो रा दिৱं सत्यधৰ्मा जजान । यश्चापश्चन्द्रा वृहतीৰ्जजान कस्मै देৱाय हरिषा रिधेम ॥
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