ओइ वुझि कालवैशाखी
Oi bujhi kalboishakhi
प्रकृति
ओइ वुझि कालवैशाखी सन्ध्या-आकाश देय़ ढाकि॥ भय़ की रे तोर भय़ कारे, द्वार खुले दिस चार धारे– शोन् देखि घोर हुङ्कारे नाम तोरइ ओइ याय़ डाकि॥ तोर सुरे आर तोर गाने दिस साड़ा तुइ ओर पाने। या नड़े ताय़ दिक नेड़े, या यावे ता याक छेड़े, या भाङा ताइ भाङवे रे– या रवे ताइ थाक वाकि॥
यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Oi bujhi kaalboishaakhi Sondha-aakash dey dhaaki. Bhay ki re tor bhay kaare, dwaar khule dis chaar dhare - Shon dekhi ghor hunkare naam tori oi jaay daaki. Tor sure aar tor gaane Dis saara tui or paane. Ja nare taay dik nere, ja jaabe ta jaak chere, Ja bhaanga taai bhaangbe re - ja rabe taai thaak baaki.
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दिनेंद्रनाथ ठाकुर1882–1935Rabindranath's grand-nephew and the principal notator of his songs — the poet called him the keeper of all his songs. Taught music at Santiniketan.Photographer unknown, c. 1935 · Wikimedia Commons, public domain - रचनाकाल
- 1919(১৩২৬)
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