सहज हवि, सहज हवि, ओरे मन, सहज हवि
Sahaj habi sahaj
पूजा
१८९
सहज हवि, सहज हवि, ओरे मन, सहज हवि–
काछेर जिनिस दूरे राखे तार थेके तुइ दूरे र’वि॥
केन रे तोर दु हात पाता– दान तो ना चाइ, चाइ ये दाता–
सहजे तुइ दिवि यखन सहजे तुइ सकल लवि॥
सहज हवि, सहज हवि, ओरे मन, सहज हवि–
आपन वचन-रचन हते वाहिर हय़े आय़ रे कवि।
सकल कथार वाहिरेते भुवन आछे हृदय़ पेते,
नीरव फुलेर नय़न-पाने चेय़े आछे प्रभात-रवि॥ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Sahoj hobi, sahoj hobi, ore mon, sahoj hobi - Kaachher jinish dure raakhe taar theke tui dure robi. Keno re tor du haat paata - daan to na chaai, chaai je daata - Sahoje tui dibi jakhon sahoje tui sakal lobi. Sahoj hobi, sahoj hobi, ore mon, sahoj hobi - Aapon bachon-rachon hote baahir hoye aay re kobi. Sakol kathaar baahirete bhuban aachhe hridoy pete, Nirab phuler nayon paane cheye aachhe probhaat robi.
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- पर्याय
- पूजा · 189(পূজা)
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- संकलन
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- स्थान
- सुरुल(সুরুল)
- स्वरबितान खण्ड
- स्वरबीतन ४४(স্বরবিতান ৪৪)
- स्वरलिपि
- सुधीर चंद्र करसुधीर चंद्र कर1906–1977Rabindranath's personal scribe in his last years: when illness kept the poet from writing, he dictated and Sudhirchandra set it down.
- रचनाकाल
- 25 September 1914(৯ আশ্বিন ১৩২১)
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