आज किछुतेइ याय़ ना मनेर भार
Aj kichutei jay na
प्रकृति
आज किछुतेइ याय़ ना मनेर भार,
दिनेर आकाश मेघे अन्धकार– हाय़ रे॥
मने छिल आसवे वुझि,
आमाय़ से कि पाय़ नि खुँजि–
ना-वला तार कथाखानि जागाय़ हाहाकार॥
सजल हाओय़ाय़ वारे वारे
सारा आकाश डाके तारे।
वादल-दिनेर
दीर्घश्वासे जानाय़ आमाय़ फिरवे ना से–
वुक भरे से निय़े गेल विफल अभिसार॥ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Aaj kichhutei jaay na moner bhaar, Diner aakash meghe aandhokar - haay re. Mone chhilo aasbe bujhi, aamay se ki paay ni khnuji - Na-bala taar kathakhaani jaagay haahaakar. Sajolo haaway baare baare Saara aakash daake taare. Baadol-diner dirghoshwaase jaanay aamay phirbe na se - Buk bhore se niye gelo biphalo obhisar.
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दिनेंद्रनाथ ठाकुर1882–1935Rabindranath's grand-nephew and the principal notator of his songs — the poet called him the keeper of all his songs. Taught music at Santiniketan.Photographer unknown, c. 1935 · Wikimedia Commons, public domain / साहाना देवीसाहाना देवी1897–1990A singer whom Rabindranath held in deep affection, and among the most widely heard voices in Rabindrasangeet; later a disciple of Sri Aurobindo at Pondicherry. - रचनाकाल
- June 1924(আষাঢ় ১৩৩১)
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