आपनारे दिय़े रचिलि रे कि ए
Aponare diye rochili
पूजा
१८४
आपनारे दिय़े रचिलि रे कि ए आपनारइ आवरण!
खुले देख् द्वार, अन्तरे तार आनन्दनिकेतन॥
मुक्ति आजिके नाइ कोनो धारे, आकाशे सेओ ये वाँधे कारागारे,
विषनिश्वासे ताइ भरे आसे निरुद्ध समीरण॥
ठेले दे आड़ाल ; घुचिवे आँधार– आपनारे फेल् दूरे–
सहजे तखनि जीवन तोमार अमृते उठिवे पूरे।
शून्य करिय़ा राख् तोर वाँशि, वाजावार यिनि वाजावेन आसि–
भिक्षा ना निवि, तखनि जानिवि भरा आछे तोर धन॥ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Aaponare diye rochili re ki e aaponari aaboran ! Khule dekh dwaar, antare taar aanondoniketon. Mukti aajike naai kono dhaare, aakash seo je bnaadhe kaaragare, Bishonishwashe taai bhore aashe nirudhho somiron. Tthele de aaral; ghuchibe aandhar - aaponare phel dure - Sahoje takhoni jiban tomar amrite utthibe pure. Shunyo koriya raakh tor bnaashi, baajabar jini baajaben aasi - Bhikkha na nibi, takhoni jaanibi bhara aachhe tor dhan.
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- पूजा · 184(পূজা)
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- दिनेंद्रनाथ ठाकुर
दिनेंद्रनाथ ठाकुर1882–1935Rabindranath's grand-nephew and the principal notator of his songs — the poet called him the keeper of all his songs. Taught music at Santiniketan.Photographer unknown, c. 1935 · Wikimedia Commons, public domain - रचनाकाल
- 14 April 1926(১ বৈশাখ ১৩৩৩)
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