दुय़ार मोर पथपाशे
Duar mor pathapashe
विचित्र
दुय़ार मोर पथपाशे, सदाइ तारे खुले राखि।
कखन् तार रथ आसे व्याकुल हय़े जागे आँखि॥
श्रावने
शुनि दूर मेघे लागाय़ गुरु गरो-गरो,
फागुने शुनि वाय़ुवेगे जागाय़ मृदु मरो-मरो–
आमार वुके उठे जेगे चमक तार थाकि थाकि॥
सवाइ देखि याय़ चले पिछन-पाने नाहि चेय़े
उतल रोले कल्लोले पथेर गान गेय़े गेय़े।
शरৎ-मेघ याय़ भेसे उधाओ हय़े कत दूरे
येथाय़ सव पथ मेशे गोपन कोन् सुरपुरे।
स्वपने ओड़े कोन् देशे उदास मोर मनोपाखि॥ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Duwar mor pathopashe, sadai taare khule raakhi. Kakhon taar ratho aase byakul hoye jaage aakhi. Shraabone shuni dur meghe laagay guru garo-garo, Phaagune shuni baayubege jaagay mridu maro-maro - Aamar buke utthe jege chamok taari thaaki thaaki. Sabai dekhi jaay chole pichan-paane naahi cheye Utalo role kallole pather gaan geye geye. Sharot-megh jaay bhese udhaao hoye kato dure Jethay sab patho meshe gopan kon suropure. Swapone ore kon deshe udaas mor monopaakhi.
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दिनेंद्रनाथ ठाकुर1882–1935Rabindranath's grand-nephew and the principal notator of his songs — the poet called him the keeper of all his songs. Taught music at Santiniketan.Photographer unknown, c. 1935 · Wikimedia Commons, public domain - रचनाकाल
- 1916(১৩২৩)
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