मधु-गन्धे-भरा मृदु-स्निग्धछाय़ा नीप-कुञ्जतले
Madhu gondhe bhora
प्रकृति
मधु -गन्धे-भरा मृदु -स्निग्धछाय़ा नीप -कुञ्जतले श्याम -कान्तिमय़ी कोन् स्वप्नमाय़ा फिरे वृष्टिजले॥ फिरे रक्त-अलक्तक-धौत पाय़े धारा -सिक्त वाय़े, मेघ -मुक्त सहास्य शशाङ्ककला सिँथि -प्रान्ते ज्वले॥ पिय़े उच्छल तरल प्रलय़मदिरा उन् मुखर तरङ्गिणी धाय़ अधीरा, कार निर्भीक मूर्ति तरङ्गदोले कल -मन्द्ररोले। एइ ताराहारा नि:सीम अन्धकारे कार तरणी चले॥
यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Modhu -gandhe bhara mridu -snigdhochhaaya nipo -kunjotale Shyamo -kaantimoyi kon swapnomaaya phire brishtijale. Phire rakto-aloktako-dhouto paaye dhaara -sikto baaye, Megho -mukto sahasyo shashankokala snithi -praante jwale. Piye uchchhalo tarol prolayomodira un -mukhoro tarongini dhaay adhira, Kaar nirbhiko murti tarongodole kalo -mandrorole. Ei taarahaara nihsimo andhokare kaar taroni chole.
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शांतिदेव घोष1910–1999An ashramite of Santiniketan who learnt his songs from Rabindranath himself and travelled with him to Sri Lanka, Java and Bali. Singer, dancer, actor, author and long-serving teacher at Sangit Bhavana.Photographer unknown, 1980 · Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0 - रचनाकाल
- 1937(১৩৪৪)
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