फागुनेर शुरु हतेइ शुकनो पाता झरल यत
Phaguner shuru hotei
प्रकृति
फागुनेर शुरु हतेइ शुकनो पाता झरल यत
तारा आज केँदे
शुधाय़, ‘सेइ डाले फुल फुटल कि गो,
ओगो कओ फुटल कत।’
तारा कय़, ‘हठाৎ हाओय़ाय़ एल
भासि
मधुरेर सुदूर हासि, हाय़।
ख्यापा हाओय़ाय़ आकुल हय़े झरे गेलेम शत शत।’
तारा कय़, ‘आज कि तवे एसेछे से
नवीन वेशे।
आज कि तवे एत क्षणे
जागल वने ये गान छिल मने मने।
सेइ वारता काने निय़े
याइ चले एइ वारेर मतो।’ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Phaaguner shuru hotei shukno paata jharlo jato Taara aaj knede shudhay, 'Sei daale phul phutlo ki go, Ogo kao phutlo kato.' Taara koy, 'Hattath haaway elo bhaasi Modhurer sudur haasi haay. Khyapa haaway aakul hoye jhore gelem shato shato.' Taara koy, 'Aaj ki tobe esechhe se nobin beshe. Aaj ki tobe etokhone jaaglo bone je gaan chhilo mone mone. Sei barota kaane niye Ja ai jaai chole ei baarer mato.'
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दिनेंद्रनाथ ठाकुर1882–1935Rabindranath's grand-nephew and the principal notator of his songs — the poet called him the keeper of all his songs. Taught music at Santiniketan.Photographer unknown, c. 1935 · Wikimedia Commons, public domain - रचनाकाल
- 1922(১৩২৯)
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