সকলেরে কাছে ডাকি
Sakalere kachhe daki
Porishishta
सकलेरे काछे डाकि आनन्द-आलये थाकि अमृत करिछ वितरण । पाइया अनन्त प्राण जगत गाहिछे गान गगने करिया विचरण । सूर्य शून्यपथे धाय— विश्राम से नाहि चाय, सङ्गे धाय ग्रहपरिजन । लभिया असीम वल छुटेछे नक्षत्रदल, चारि दिके चलेछे किरण । पाइया अमृतधारा नव नव ग्रह तारा विकशिया उठे अनुक्षण— जागे नव नव प्राण, चिरजीवनेर गान पूरितेछे अनन्त गगन । पूर्ण लोक लोकान्तर, प्राणे मग्न चराचर प्राणेर सागरे सन्तरण । जगते ये दिके चाइ विनाश विराम नाइ, अहरह चले यात्रीगण । मोरा सवे कीटवৎ, समुखे अनन्त पथ की करिया करिव भ्रमण । अमृतेर कणा तव पाथेय दियेछ, प्रभो, क्षुद्र प्राणे अनन्त जीवन ॥
यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Sakolere kaachhe daaki aanondo-aalaye thaaki Amrito korichho bitaran. Paaiya anonto praan jagot gaahichhe gaan Gagone koriya bicharan. Suryo shunyapathe dhaay- bishram se naahi chaay, Sange dhaay grahoporijan. Lobhiya asim bal chhutichhe nakkhatradal Chaari dike chalechhe kiran. Paaiya amritodhaara nabo nabo groho taara Bikoshiya uthe anukhon - Jaage nabo nabo praan, chirojibaner gaan Puritechhe anonto gagon. Purna lok lokaantar, praane magno charaachar - Praaner saagore santaran. Jagote je dike chaai binash biram naai, Ahoraho chale jatrigan. Mora sabe keetbat, samukhe anonto path Ki koriya koribo bhromon. Amriter kana tabo patheyo diyechho, prabho, Khudra praane anonto jiban.
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यूट्यूब पर
- पर्याय
- Porishishta · 5(পরিশিষ্ট)
- राग
- Bhairav(ভৈরব)
- ताल
- Jhaptaal(ঝাঁপতাল)
- संकलन
- Robichhaya
- स्वरबितान खण्ड
- 45
- रचनाकाल
- 1883(১২৯০)
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