আষাঢ়সন্ধ্যা ঘনিয়ে এল
Asharsandhya ghoniye elo
Prakriti
आषाढ़सन्ध्या घनिय़े एल, गेल रे दिन वय़े।
वाँधन-हारा वृष्टिधारा झरछे रय़े रय़े॥
एकला वसे
घरेर कोणे की भावि ये आपन-मने,
सजल हाओय़ा
यूथीर वने की कथा याय़ कय़े॥
हृदय़े आज ढेउ दिय़ेछे, खुँजे ना पाइ कूल–
सौरभे प्राण काँदिय़े तोले भिजे वनेर फुल।
आँधार
राते प्रहरगुलि कोन् सुरे आज भरिय़े तुलि,
कोन्
भुले आज सकल भुलि आछि आकुल हय़े॥ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Aasharhsondhya ghoniye elo, gelo re din boye. Bnaadhon-haara brishtidhaara jhorchhe roye roye. Ekla bose gharer kone ki bhaabi je aapon mone, Sajol haawa juthir bone ki katha jaay koye. Hridaye aaj dheu diyechhe, khnuje na paai kul; Sourabhe praan knaadiye tole bhije boner phul. Aandhar raate proharoguli kon sure aaj bhoriye tuli, Kon bhule aaj sakol bhuli aachi aakul hoye.
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यूट्यूब पर
- पर्याय
- Prakriti · 33(প্রকৃতি)
- उप-पर्याय
- Borsha
- राग
- Iman-Kalyan(ইমন-কল্যাণ)
- घराना
- Hindustani
- ऋतु
- Barsha(বর্ষা)
- संकलन
- Geetanjali
- स्थान
- Shilaidaha
- स्वरबितान खण्ड
- 11 (Ketaki) / 37
- स्वरलिपि
- Dinendranath Tagore / Surendranath Bandopadhyay
- रचनाकाल
- 13 July 1909(২৯ আষাঢ় ১৩১৬)
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