चक्षे आमार तृष्णा ओगो
Chokkhe amar trishna
प्रकृति Chandalika से · दृश्य 2
चक्षे आमार तृष्णा ओगो, तृष्णा आमार वक्ष
जुड़े।
आमि वृष्टिविहीन वैशाखी दिन, सन्तापे प्राण याय़ ये पुड़े॥
झड़ उठेछे तप्त हाओय़ाय़, मनके
सुदूर शून्ये धाओय़ाय़–
अवगुन्ठन याय़ ये उड़े॥
ये फुल कानन करत आलो
कालो हय़े से शुकालो।
झरनारे के दिल
वाधा–
निष्ठुर पाषाणे वाँधा
दुःखेर शिखरचूड़े॥ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
Chokkhe aamar trishna, ogo trishna aamar bokkho jure. Aami bristibiheen boishakhee din, santape praan jaay je pure. Jhar utthechhe tapto haaway haaway, monke sudur shunye dhaaway - Abogunthan jaay je ure. Je phul kaanon korto aalo, Kaalo hoye se shukalo. Jharnare ke dilo baadha - nishtthur paashane bnaadha Dukkher shikharochure.
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- शैलजरंजन मजुमदारशैलजरंजन मजुमदार1900–1992A teacher of chemistry at Visva-Bharati who became one of the great teachers of Rabindrasangeet, and the notator of many songs of the poet's last years. / दिनेंद्रनाथ ठाकुर
दिनेंद्रनाथ ठाकुर1882–1935Rabindranath's grand-nephew and the principal notator of his songs — the poet called him the keeper of all his songs. Taught music at Santiniketan.Photographer unknown, c. 1935 · Wikimedia Commons, public domain - रचनाकाल
- 1933(১৩৪০)
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