हृदय़े मन्द्रिल डमरु गुरु गुरु
Hridaye mandrilo domaru
प्रकृति
हृदय़े मन्द्रिल डमरु गुरु गुरु,
घन मेघेर भुरु कुटिल कुञ्चित,
हल रोमञ्चित वन वनान्तर–
दुलिल चञ्चल वक्षोहिन्दोले मिलनस्वप्ने
से कोन् अतिथि रे।
सघन-वर्षण-शव्द-मुखरित वज्रसचकित त्रस्त
शर्वरी,
मालतिवल्लरी काँपाय़ पल्लव करुण कल्लोले–
कानन शङ्कित झिल्लिझंकृत॥ यह गीत का अनुवाद नहीं, केवल बांग्ला बोलों का देवनागरी लिप्यंतरण है। अनुवाद के लिए अनुवाद टैब देखें।
लिप्यंतरण
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दिनेंद्रनाथ ठाकुर1882–1935Rabindranath's grand-nephew and the principal notator of his songs — the poet called him the keeper of all his songs. Taught music at Santiniketan.Photographer unknown, c. 1935 · Wikimedia Commons, public domain - रचनाकाल
- 1933(১৩৪০)
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